तुलसीदास जी का जीवन परिचय | Biography of Tulsidas in Hindi

प्रत्येक वर्ष के श्रावण महीने की सप्तमी के दिन कवि तुलसीदास की जयंती मनाई जाती है। तुलसीदास जी को भगवान श्रीराम के भक्तों में से एक के रूप में ख्याति मिली हुई है। इसके अतिरिक्त उनको (Tulsidas Biography in Hindi) विभिन्न महत्वपूर्ण ग्रंथो की रचनाओं के लिए भी जाना जाता है। खासतौर से हिंदी साहित्य में तो तुलसीदास की रचनाओं को विशेष महत्व दिया जाता है। अपने पदों के माध्यम से तुलसीदास जी ने भक्ति एवं रामजी की महिमा का वर्णन किया है। इसके साथ ही उन्होंने रामचरित मानस की भी रचना की है, जिसके माध्यम से भगवान श्रीराम के विषय में बहुत सी जानकारी दी है।

तुलसीदास जी का जीवन परिचय | Biography of Tulsidas in Hindi
तुलसीदास जी का जीवन परिचय | Biography of Tulsidas in Hindi

तुलसीदास जी

तुलसीदास का सम्पूर्ण जीवन एक पूर्ण भक्त का विशिष्ट उदाहरण है। कुछ मान्यता के अनुसार इनको रामायण रचयिता महर्षि वाल्मीकि का भी अवतार कहते है। रामचरित मानस का कथानक वालनिकी रामायण से प्रभावित है। उनके इस ग्रन्थ को उत्तर भारत में बड़े ही श्रद्धाभाव एवं आदर से पढ़ा जाता है। रामचरित मानस को दुनिया के सबसे अधिक लोकप्रिय श्रेष्ठ 100 काव्यों की सूची में 46वां स्थान प्राप्त हुआ है। इसके अतिरिक्त उनका ‘विनय पत्रिका’ नाम की रचना भी काफी लोकप्रिय है।

वास्तविक नामगोस्वामी तुलसीदास
जन्मतिथिसंवत 1511 (साल 1454)
जन्मस्थलराजापुर, बाँदा (उत्तर प्रदेश)
माता-पिताहुलसी देवी, आत्माराम दुबे
शिक्षावेद, पुराण एवं उपनिषद
पत्नी-बच्चेरत्नावती, तारक (बेटा)
गुरुनरहरिदास
उपनाम/ ख्यातिगोस्वामी, अभिनववाल्मीकि
देहांतसंवत 1680 (साल 1623)

तुलसीदास जी का जीवन

भारतीय साहित्यिक इतिहास में तुलसीदासजी को एक श्रेष्ठ कवि और दार्शनिक की उपाधि मिली हुई है। इनका ग्रंथ ‘रामचरित मानस’ को अभी तक के सबसे श्रेष्ठ महाकाव्य का स्थान मिला हुआ है। तुलसी का पूरा नाम ‘गोस्वामी तुलसीदास’ है और इनका जन्म संवत 1511 में उत्तर प्रदेश के राजापुर जिले के बाँदा गाँव (वर्तमान में चित्रकूट) में हुआ था। कुछ मत के मुताबिक इंक जन्म को सोरो शूकरक्षेत्र (वर्तमान में कासगंज, एटा उत्तर प्रदेश) में भी बताने है। कथानुसार अपने जन्म के समय शिशु तुलसी काफी हस्टपुष्ट थे और इनके सभी दांत थे चूँकि ये अपनी माता के गर्भ में 12 माह तक रहे थे।

बाल्यकाल

इस समय पर देश पर मुग़ल राजा अकबर का शासन था। वे एक सरयूपारीण ब्राह्मण परिवार के सदस्य थे इस कारण इनको बचपन से ही हिन्दू शास्त्रों का अच्छा ज्ञान मिल सका। इनके पिता का नाम आत्माराम शुक्ल दुबे था एवं माता का नाम हुलसी था। इन्हे बाल्यकाल से ही ‘तुलसीराम’ का नाम मिला हुआ था। एक कथा के अनुसार शिवजी की कृपा से रामशैल में निवास करने वाले श्री अनंतानन्द जी के पटशिष्य श्रीनरहर्यानन्द जी (बाबा नरहरि) ने रामबोला नाम से प्रसिद्ध बच्चे को ढूँढ लिया और पुरे विधिविधान से इस बच्चे को ‘तुलसीदास’ नाम दिया। 1561 में बालक तुलसी को अयोध्या लाकर माघ शुक्ला पंचमी के दिन यज्ञोपवीत संस्कार मिला। अपने संस्कार के समय बिना पहले से ज्ञात गायत्री मन्त्र का सही उच्चारण तुलसीदास ने किया जिसको देखकर सभी लोग काफी चकित हो गए।

इसके बाद ही बाबा नरहरि ने वैष्णवों के 5 संस्कार करने के बाद बालक तुलसी को ‘राम-मन्त्र’ की दीक्षा प्रदान की। इन्होने बालक को अपने यहाँ (अयोध्या) रखकर अध्ययन का अवसर दिया। तुलसी बाल्यकाल से ही प्रतिभा के धनी रहे थे और अपने गुरु के मुँह से निकले हर वाक्य को अच्छे से स्मरण रखने की स्मृति रखते थे। इसके कुछ समय के बाद वे अपने गुरु के साथ शूकरक्षेत्र (सोरो) में आ गए। यहाँ पर बाबा नरहरि ने तुलसी को रामकथा सुनाई किन्तु वे इसको समझ पाने में असमर्थ ही रहे।

हालाँकि इनको बचपन से ही गरीबी एवं परेशानियों का सामना करना पड़ा था किन्तु इन्होने इन स्थितियों के बीच भी अपना अध्ययन एवं भक्ति के कार्य को सच्चे मन से जारी रखा। तुलसी शुरू से ही श्रीराम के सच्चे भक्त रहे है और वे अपने गुरु से शूकर क्षेत्र में जाकर ज्ञान प्राप्त करते रहते थे।

रत्नावती से विवाह

संवत 1583 में 29 साल की उम्र में तुलसीदास जी की शादी राजापुर से थोड़ी ही दुरी पर बसे गाँव की रूपवान भारद्वाज गोत्र की कन्या बुद्धिमती (रत्नावली के नाम से अधिक प्रसिद्ध) से हुआ था। लेकिन इनका गौना नहीं हो पाया था इस कारण से वे थोड़े समय के लिए काशी चले आए। यहाँ वे शेषसनातन के साथ रहकर वेद-वेदांग का अध्ययन करने लगे। किन्तु कुछ ही समय बीतने के बाद यहाँ उनको अपनी पत्नी का विरह उठने लगा जिससे वे काफी व्यथित रहने लगे। ज्यादा परेशान होने पर तुलसी ने अपने गुरु की अनुमति के बाद राजापुर आने का निश्चय किया। चूँकि गौना का संस्कार न होने के कारण अभी इनकी पत्नी अपने घर यानी मायके में ही रह रही थी। तुलसी ने रात के समय में ही अपनी पत्नी से मिलने के लिए उफनाती नदी को पार कर लिया और सीधे पत्नी के कमरे में पहुँच गए। रत्नावती भी रात्रि के इस समय उनको देखकर काफी चकित सी रह गयी।

मोह-माया का तिरस्कार

पत्नी ने तुलसी को लोकलाज की बात कहकर चुपचाप वापिस जाने की सलाह दी। तुलसीदास जी अपनी पत्नी को लेकर काफी भावुक एवं रागी प्रवृति के थे। ऐसी कथा है कि अपनी पत्नी के मायके जाने पर तुलसी उनके घर के पास में निवास करने लगे थे। इस विषय में जानकारी मिलने पर इनकी पत्नी ने उनके प्रेम की अस्वीकार किया। वे तुलसीदास को कहने लगी कि उनको जितना प्रेम अपनी पत्नी से है उतना प्रेम भगवान राम से होना चाहिए। इसी घटना के समय तुलसी की पत्नी रत्नावती ने उनको एक दोहे के माध्यम से शिक्षा दी और तुलसी के जीवन में क्रांति लाने का कार्य किया।

अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति, नेकु जो होती राम से, तो काहे भव-भीत ?

अपनी पत्नी की इन पंक्तियों को सुनने के बाद तुलसी ने वापिस अपने घर यानी राजापुर आने का फैसला कर लिया। किन्तु अपने घर आपने पर उनको पिता की मृत्यु होने का समाचार मिला साथ ही उनकी अनुपस्थिति में घर पूरी तरह से नष्ट हो चुका था। तुसलीदास जी ने पुरे विधि पूर्वक अपने पिताजी का अंतिम संस्कार कर दिया। इसके कुछ वर्ष बीत जाने के बाद इनको दाम्पत्य जीवन में पुत्र संतान तारक की भी प्राप्ति हुई।

अपनी पत्नी की यह बात तुलसी के अंतर्मन को काफी प्रभावित कर गयी और उन्होंने सांसारिक मोह-माया से मुँह मोड़कर एक भक्त के रूप में अपने जीवन को नियोजित कर लिया।

भगवान राम और हनुमान जी से भेंट

इसी घटना के अगले वर्षों में तुलसी ने आध्यात्मिक पिपासा को शांत करने के लिए देशभर में काफी विचरण किया। इन दौरान वे बहुत से तीर्थों पर भी गए और भगवान राम को पाने एवं धर्म की खोज करते रहे। अब वे राजापुर से काशी में आकर लोगो को रामकथा का मर्म समझने लगे। कहानी के अनुसार उनके रामकथा करने के दौरान ही उन्हें एक भूत से मिलने का मौका मिला जिसने तुलसी को भगवान हनुमान से मिलने का स्थान बता दिया। तुलसी ने हनुमानजी से मिलने का निश्चय किया और भेट होने पर उनसे श्रीराम के दर्शन करने की इच्छा प्रकट की। हनुमानजी ने उन्हें बताया कि आपको चित्रकूट में ही श्रीराम के दर्शन का अवसर मिल सकता है। इसके बाद वे श्रीराम की नगरी अयोध्या में जाकर रुके। चित्रकूट में वे रामघाट पर ही अपना आसन लगाकर पूजा-भजन में लगे रहे। एक दिन जब तुलसी प्रदक्षिणा के लिए निकले हुए थे तो उनको यही पर भगवान राम के दर्शन प्राप्त हुए।

तुलसी ने वर्णन किया है कि उन्हें दो सुन्दर राजकुमार धनुष-बाण के साथ घोड़े पर सवार मिले जिनको वो पहली बार में पहचान भी ना सके। इस घटना के बाद में हनुमानजी ने तुलसी को उनके परिचय के बारे में बताया जिसको सुनने के बाद तुलसी को काफी पछतावा भी हुआ। इसके बाद हनुमानजी ने उनको राहत देते हुए प्रातः फिर से मिलने की जानकरी दी। संवत 1607 में मौनी अमावस्या में बुधवार के दिन में ही तुलसी को दुबारा श्रीराम के साक्षत्कार का अवसर मिल गया। श्रीराम ने बालक के रूप में तुलसी से कहा – ‘बाबा हमें चन्दन चाहिए, क्या आप हमें चन्दन दे सकते है?” इसी समय हनुमानजी ने अवसर का बोध करवाने के लिए एक तोते का रूप लेकर एक दोहा गाया –

चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर। तुलसिदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥

यह पंक्तियाँ सुनकर तुरंत तुलसीदास सचेत हो गए और श्रीराम के रूप का दर्शन करने लगे। वे श्रीराम के अलौकिक दर्शन को पाकर अपने आप को भूल गए। थोड़े समय के बाद स्वयं श्रीराम ने चन्दन से तुसली एवं स्वयं को तिलक किया। यहाँ से तुलसी को अवधि भाषा में रामायण की रचना का आदेश प्राप्त हुआ जोकि उस समय की सामान्य लोक भाषा हुआ करती थी।

संस्कृत पद्यों की रचना

संवत 1628 में तुलसीदास ने हनुमानजी से अनुमति लेकर अयोध्या आने का निश्चय किया। इस समय प्रयाग में ‘माघ मेला’ चल रहा था। वे यहाँ कुछ दिन रुकना चाहते थे और त्यौहार के 6 दिनों के बाद ही वटवृक्ष के नीचे तुलसीदास को भारद्वाज एवं याज्ञवल्कय मुनियों के दर्शन प्राप्त हुआ। यहाँ पर इस समय वही कथा हो रही थी जो उन्होंने अपने गुरु से सूकरक्षेत्र में सुनी थी। माघ के मेले के खत्म होने के बाद वे दुबारा काशी चले आये। यहाँ पर तुलसीदास ने प्रहलाद घाट में एक ब्राह्मण के यहाँ आवास लिया। यही पर रहते हुए उनके ह्रदय में काव्य कार्य की शक्ति की भावना जगी और उन्होंने संस्कृत में पद्यों की रचना शुरू कर दी।

किन्तु वे जो भी रचनाएँ कर रहे थे वो रात में विलुप्त हो रही थी। इस घटनाक्रम के 8वें दिन को एक सपना आया जिसमें शिवजी एवं पार्वती ने उनके प्रणाम से प्रसन्न होकर आदेश दिया – ‘तुम आयोध्या में जाकर निवास करों एवं हिंदी में अपने पद्यों की रचना करो। मेरे वरदान से तुम्हारी सभी कविताएँ सामवेद की तरह ही फलवती है जाएगी।’ यह आदेश पाने के बाद तुलसीदास बिना देरी किये अयोध्या पहुँच गए।

रामचरितमानस की रचना

संवत 1531 में ही तुलसीदास जी ने अपने लेखन के काम की शुरुआत कर दी। साथ ही इन्होने विभिन्न साहित्यिक कृतियों का निर्माण शुरू कर दिया किन्तु इसमें से उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना ‘रामचरितमानस’ रही। इस साल की रामनवमी के दिन वही योग रहा जो त्रेता युग में रामजन्म के दिन था। इसी दिन की सुबह के समय में तुलसीदास जी ने श्रीरामचरित मानस की रचना शुरू कर दी। इस ग्रन्थ को उन्होंने 2 साल, 7 महीने एवं 26 दिन के समय में रच दिया। संवत 1633 के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में राम विवाह के ही दिन ग्रन्थ के सातों काण्ड पुरे हो गए।

इसमें तुलसीदासजी ने श्रीराम के कामों का वर्णन को बहुत ही सुन्दर कविता के द्वारा किया है। इन कविताओं को ‘चौपाई’ कहते है जो सिर्फ श्रीराम को समर्पित है। तुलसी ने हमेशा ही स्वयं को श्रीराम के समक्ष समर्पित करके भक्ति के मार्ग पर काफी जोर दिया है। अपना यह कार्य पूर्ण कर लेने के बाद तुलसीदास दुबारा काशी में पहुँचे। यहाँ पर उन्होंने श्रीरामचरितमानस भगवान विश्वनाथ एवं माँ अन्नपूर्णा को सुनाया। वे अपनी पुस्तक को विश्वनाथ मंदिर में ही रख आये और जब प्रातः के समय मंदिर के द्वार खोले गए तो देखा गया कि पुस्तक पर ‘सत्यं शिवं सुन्दरं’ अंकित हुआ है और इसके नीचे शंकर भगवान की पुष्टि भी मौजूद थी। इसके प्रत्यक्षियों ने वहाँ पर सत्यं शिवं सुन्दरं के उद्धघोष को भी सुना था।

यह भी पढ़ें :- पृथ्वीराज चौहान का इतिहास, कहानी, जीवन परिचय

तुलसी की कृतियों का विरोध

जैसे ही काशी के ब्राह्मणों को इन सभी बातों का पता चला तो वे ईर्ष्या के भाव से भर गए। ऐसे कुछ लोगों ने एक दल को बनाकर बाकायदा तुलसीदास के ग्रंथो का विरोध करना शुरू कर दिया। वे तुलसी का विरोध करते हुए उनकी रचनाओं को मिटाने में लग गए। ऐसे ही दो चोर उनकी पुस्तकों को चुराने के लिए उनके आवास पर पहुंचे तो उन्होंने दो धनुषधारी युवको को पहरा देते देखा। इनके दर्शन करने के बाद वे दो युवक भी पवित्र मन से भगवान के भजन में लीन रहने लगे।

इस घटना से भगवान की पीड़ा को जानकर तुलसीदास ने अपनी कुटिया का सारा समान लुटा दिया। उन्होंने अपनी पुस्तकों को अपने दोस्त एवं अकबर के दरबारी रत्न टोडरमल ने पास रखवा दिया। इन पुस्तको की एक अन्य प्रति को उन्होंने अपनी कुशल स्मरण शक्ति से तैयार करके रखा और इस प्रकार से उनकी पुस्तकों को प्रचारित किया जाने लगा। अब काशी के ब्राह्मणों ने भी कोई अन्य मार्ग ना होने पर महापण्डित श्री मधुसूदन सरस्वती जी से तुलसीदास की पुस्तकों को देखकर अपनी सम्मति देने को कहा। सरस्वती जी उनकी पुस्तकों को देखकर काफी खुश हुए और उन्होंने कहा – ‘काशी के आनंद वन में तुलसीदास साक्षात तुलसी का पौधा है। उसकी काव्य-मंजरी बड़ी ही मनोहर है जिस पर श्रीराम रूपी भँवरा हमेशा मँडराता रहता है।’

श्रीरामचरितमानस की परीक्षा

किन्तु अभी भी ब्राह्मणों को तिलमात्र भी संतोष नहीं था और वे इन पुस्तकों की परीक्षा का दूसरा मार्ग तलाशने लगे। उन्होंने काशी के विश्वनाथ मंदिर में भगवान के सम्मुख सबसे पहले वेद, इसके नीचे शास्त्र, फिर पुराण और सबसे नीचे ‘श्रीरामचरित मानस’ को रख दिया। अगले दिन सवेरे जब मंदिर के द्वार खोले गए तो सभी ने श्रीरामचरितमानस को वेदों के भी ऊपर यानी सबसे पहले स्थान पर पाया। इस घटना के बाद से ही सभी ब्राह्मण काफी शर्मसार हुए और उन्होंने तुरंत ही तुलसीदास से माफ़ी भी माँगी और सच्चे मन से उनके काव्य को स्वीकार कर लिया।

तुलसीदासजी की अन्य प्रमुख रचनाएँ

इनके द्वारा कुछ अन्य श्रेष्ठ कविताओं की भी रचना हुई है जैसे दोहावली, कवितावली, गीतावली, कृष्णावली, देव हनुमान एवं विनय पत्रिका इत्यादि। इनके द्वारा हनुमानजी की स्तुति की रचनाओं को बहुत आदर से ‘हनुमान चालीसा’ में भी स्थान मिला है। इसके साथ ही कुछ लघु रचानाओं जैसे वैराग्य संदीपनी, बरवै रामायण, जानकी मंगल, रामलला नहछू, पार्वती मंगल एवं संकट मोचक सम्मिलित है।

तुलसीदासजी का देहान्त

उस समय के शासक अकबर और जहाँगीर ने भी तुलसीदास के काव्य की प्रसंशा की थी।  अपने जीवन के अंतिम दिनों में तुलसीदास काशी के प्रसिद्ध घाट असीघाट में निवास कर रहे थे। यही पर एक रात में उनके पास कलियुग स्वयं भेष धारण करके आया और उनको पीड़ित करने लगा। इसी समय पर तुलसीदासजी ने भगवान हनुमान का स्मरण करना शुरू किया। हनुमानजी ने स्वयं प्रकट होकर तुलसी को प्रार्थना के पदों की रचना करने को कहा। यह आदेश पान के बाद ही तुलसीदास जी ने अपनी आखिरी रचना ‘विनय-पत्रिका’ की रचना कर डाली। रचना के पूर्ण होने के बाद उन्होंने इसे भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया। उनकी रचना पर स्वयं श्रीरामजी ने अपने हस्ताक्षर कर दिए। 

संवत 1680 में श्रावण कृष्ण तृतीया (शनिवार के दिन) तुलसीदास जी ने जीवन के 91वें साल में पवित्र नगर बनारस में ‘राम -राम’ अपने प्राण त्याग दिए।

तुलसीदास जी से सम्बंधित प्रश्न

तुलसीदास जी के बाल्यकाल का क्या नाम था?

चूँकि ये अपने जन्म के समय रोने के बजाय राम शब्द का उच्चारण कर रहे थे तो इनको माता-पिता ने ‘रामबोला’ नाम दिया था।

तुलसीदास का जन्म किस स्थान पर हुआ था?

इनका जन्म उत्तर प्रदेश राज्य के बाँदा जिले के राजापुर में हुआ था।

तुलसी दास का जन्म कब हुआ था?

इनका जन्म संवत 1511 के श्रावण मास के शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि के अभुक्त मूल नक्षत्र में हुआ था।

तुलसीदास जी की विशेष रचना कौन सी है?

उनकी रचना भाषा अवधि एवं ब्रिज है। उनकी कुछ ध्यान देने योग्य रचनाएँ श्रीकृष्ण गीतावली, कवितावली, विनय पत्रिका, दोहावली, गीतावली तथा वैराग्य संदीपनी ग्रंथ ‘ब्रज’ भाषा में हैं। और रामचरितमानस, रामलला नहछू, बरवै रामायण, पार्वती मंगल, जानकी मंगल ओर रामाज्ञा प्रश्न ‘अवधी’ भाषा की श्रृंगार रचनाएँ हैं।

Leave a Comment

Join Telegram